भगवान विष्णु का अनोखा अवतार.....
भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के आदि प्रवर्तक एवं स्वास्थ्य के अधिष्ठाता देवता होने के कारण विश्वविख्यात है . स्वास्थ्य या आरोग्य मानव जीवन का आधार है . आयुर्वेद -आयुष्य का अर्थात जीवन का विज्ञान है . जीवन के हित अहित सुख दुःख का सूक्ष्म विवेचन होने से आयुर्वेद मानव जाति का परम अभीष्ट है . वह पुरुषार्थ चतुष्टय अर्थात धर्म ,अर्थ , काम और मोक्ष का साधन होने से कल्याणमयी है . सभी के लिए जानने योग्य है . इसी आयुर्वेद के ज्ञान से सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करने वाले भगवान धन्वन्तरी न सिर्फ चिकित्सक वर्ग अपितु सम्पूर्ण मानव जाति के आराध्य देवता है .
सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु ने जगत त्राण हेतु 24 अवतार धारण किये है . जिनमे भगवान धन्वंतरी 12वे अंशावतार है अर्थात आप साक्षात विष्णु के श्रीहरी रूप है . इनके प्रादुर्भाव का रोचक वृतांत पुरानो में मिलता है . तदनुसार एक समय अवसर पाकर असुरो ने देवताओ को सताना आरम्भ कर दिया . सुखी देवगण अपने राजा इंद्र के सम्मुख उपस्थित हुए और अपनी व्यथा कही . इंद्र प्रमुख देवताओ के साथ ब्रह्माजी की शरण में पहुचे और उनसे इस परेशानी को दूर करने हेतु निवेदन किया .
ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान विष्णु के पास जाने का परामर्श दिया तब सभी इन्द्रादि देवगण भगवान विष्णु के समक्ष उपस्थित हुए और अपना दुःख उन्हें कह सुनाया . तब द्रवित होकर भगवान विष्णु ने असुरो के शमन और देवगणों के अमरत्व के लिए विचार विमर्श किया . देवो और दानवो की सामयिक संधि कराकर समुद्र मंथन की योजना बनाई . एतदर्थ मन्दराचल पर्वत को मंथन दंड , हरि रूप कुर्म को दण्ड आधार तथा वासुकि नागराज को रस्सी तथा समुद्र को नवनीत पात्र बनाया . देवो और दानवो ने मिलकर समुद्र का मंथन किया जिसके फलस्वरूप निम्न 14 रत्न निकले – लक्ष्मी ,कौस्तुभ मणि , कल्प वृक्ष ,मदिरा , अमृत कलश धारी धन्वन्तरी , अप्सरा ,उच्सश्र्वा नामक घोडा , विष्णु का धनुष ,पांचजन्य शंख ,विष , कामधेनु , चन्द्रमा और ऐरावत हाथी .
No comments