जय श्री राम जय श्री राम

रामसेतु का भेद खोला चिरजीवी हनुमान जी

अद्धभुत कथा :
रामसेतु का भेद खोला चिरंजीवी हनुमान जी ने :
[टिप्पणी : इस अध्याय का दूसरा आधा भाग मनातीत ज्ञान से सरोबार है - ऐसा ज्ञान जो हमें मानव मन की सीमाओं से बाहर ले जाता है | अतः मुख्यधारा के भक्त जो अपने मानव मस्तिष्क से अत्यधिक रूप से जुड़े हैं , उन्हें यह ज्ञान ग्रहण करने में कठिनाई हो सकती है | परन्तु कुछ गृहस्थ साधक ऐसे हैं जिन तक यह अध्याय पहुंचना आवश्यक है | ]
चरण पूजा का पहला चरण जिसके यजमान बसंत थे , पूरा हो चुका था | यजमान बसंत ने अर्पण में फलों की टोकरी भेंट की थी और प्रसाद के रूप में हनुमान जी से पाताल का ज्ञान पाया था | उसकी गुप्त इच्छा अपने परिवार के खोये रत्न पाने की थी, लेकिन उसकी यह इच्छा अभी तक अधूरी थी | हनुमान जी आसन से खड़े हो चुके थे | हनुमंडल में उपस्थित अन्य मातंग भी अपना सिर श्रद्धा से झुकाए और हाथ जोड़े हुए खड़े हो गए थे | प्रार्थना सभा भंग होने से पहले उर्वा ने हनुमान जी से अनिवार्य रूप से पूछा - “हे प्रभु , रत्न समुद्र के तल में हैं तो वहां से वापिस कैसे आयेंगे ? यह असंभव प्रतीत होता है - pपहले तो समुद्र की इतनी गहराई में पहुंचना और फिर उन छोटे छोटे रत्नों को ढूंढना !”
बाबा मातंग को उर्वा के इस व्यवहार से क्रोध आ गया | उन्होंने उर्वा की तरफ क्रोधित दृष्टि से देखा, फिर हनुमान जी की और हाथ जोड़कर बोले - “हे प्रभु इसे क्षमा कर दीजिये | यह नादान और अज्ञानी है | उसे नहीं पता कि यजमान द्वारा प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात् प्रार्थना सभा अवश्य भंग होनी चाहिए | मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ |”
हनुमान जी मुस्कुराये | उन्होंने पहले उर्वा की ओर देखा और फिर बाबा मातंग की ओर देखा | उसके पश्चात् वे आसन के सामने बने जल कुंड के ऊपर चले और अदृश्य हो गए |
बाबा मातंग ने सभा भंग की रीतियाँ प्रारंभ की | यजमान बसंत ने बाबा मातंग की निगरानी में हनुमंडल की परिधि पर रखे दीयों को एक एक करके बुझा दिया | फिर हनुमंडल के मध्य में स्थापित वेदी से अग्नि देव को विदा किया गया | उर्वा ने इन रीतियों को पूरा करने में सहायता करने का प्रयत्न किया लेकिन बाबा मातंग ने उसे ऐसा नहीं करने दिया |
अंततः जब सभा भंग हुई और मातांगो ने अपने अपने घर की ओर प्रस्थान करना शुरू किया तब उर्वा ने बाबा के सामने अपना पक्ष रखने का प्रयत्न किया | बाबा ने उसको बोलने का अवसर नहीं दिया |
बाद में जब मातंग नाश्ता कर रहे थे तब उर्वा बाबा के पास बैठा और बोलने की कोशिश की | बाबा मातंग गरजे - “अगर बसंत ने स्वयं ही प्रसाद में रत्न नहीं मांगे तो तुम कौन होते हो उसके लिए रत्न मांगने वाले, वो भी तब जब हनुमान जी अपने आसन से उठ चुके थे | तुमने हद पार कर दी है उर्वा ! अब मैं तुम्हे होतर नियुक्त नहीं करूँगा | अब से उर्मी होतर का कार्यभार संभालेगी |”
उर्वा ने बोलने की कोशिश की - “बाबा , मैं तो केवल यह चाहता था कि ...”
“क्या चाहते थे तुम?” बाबा फिर गरजे - “तुम क्या सोचते हो , क्या चरण पूजा तुम्हारे चाहने न चाहने के अनुसार चलेगी? ‘मैं तो ये चाहता था’ का क्या अर्थ है ? क्या तुम्हारा चाहना हमारे पुरखों द्वारा सदियों से निर्धारित विधि विधान से भी ऊपर है?”
उर्वा रो पड़ा | उसने अपनी नाश्ते की थाली उठाई और वहां से तुरंत सुबकते हुए उठकर चला गया |
उर्मी भी बाबा मातंग के पास ही बैठी हुई थी | वह सब कुछ चुपचाप देख रही थी | बाबा ने उर्मी से कहा - “मेरा भी यही मानना है कि खोये हुए रत्न बसंत के परिवार को वापिस मिलने चाहिए ताकि उसके पिता को मुक्ति मिल सके | लेकिन हम मनुष्य हैं | जो हम सही समझते हैं वह सही हो यह आवश्यक नहीं है | क्या तुमने देखा नहीं उर्मी, बसंत द्वारा अर्पण के लिए लाये गए फलों के ढेर में से केवल एक छोटा सा केले का टुकड़ा प्रभु के चरणों में अर्पण के योग्य निकला | इससे पता चलता है कि बसंत पर सुरों और असुरों का कितना प्रभाव है | तो हम कैसे निश्चिन्त हो सकते हैं कि रत्न प्राप्त करने की हमारी इच्छा, हमारी स्वयं की इच्छा है ? हो सकता है कि यह इच्छा हमारे अन्दर सुरों तथा असुरों द्वारा प्रेरित की गई हो |
“और ऐसा केवल बसंत के साथ नहीं है | मुझे डर है कि पिछले 41 साल में हम सब लोग सुरों और असुरों के अत्यधिक प्रभाव में आ गए हैं | हम अपने आपको पवित्र समझते हैं लेकिन यह पवित्रता की भावना असुरों द्वारा प्रेरित भी तो हो सकती है | मुझे लगता है कि हनुमान जी (महाभारत के ) भीष्म का जिक्र करके मेरी तरफ संकेत कर रहे थे | भीष्म सोचता था कि वह बहुत धर्ममार्गी है लेकिन असल में वह बुरी तरह असुरों की जकड में था|”
“चिंता मत करो बाबा मातंग | आप सुरों और असुरों के प्रभाव में नहीं हो |” यह हनुमान जी की आवाज थी | वे वहां पर बैठे थे जहाँ कुछ पल पहले उर्मी बैठी थी |
हनुमान जी को अपने साथ नाश्ता करते पाकर बाबा मातंग आनंद के अतिरेक में भौंचक्के हो गए | उन्हें यह नहीं सूझ रहा था कि वे क्या करें | आदर और समर्पण पूर्वक हाथ जोड़ते हुए बुदबुदाए - “प्रभु !”
हनुमान जी ने आगे कहा - “... और आप अपने आपको लगातार निरिक्षण में रखते हैं | यह इस बात का प्रतीक है कि आप पवित्र हैं | आपने “बाबा” के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को अभी तक सुचारू रूप से निभाया है | और उर्वा ने भी कुछ गलत नहीं किया | जो प्रश्न उसने पुछा वह इस समय सभी साधक मातांगो के मन में है | मुझे पता है कि कब एक साधक के मन में प्रश्न स्थापित किया जाए और कब उसका उत्तर दिया जाए | जहाँ तक रीतियों का प्रश्न है , मातंग परम्परा के रक्षक के रूप में आपका क्रोध उचित ही है | आपके क्रोध के कारण उर्वा अभी यह चिंतन कर रहा है कि वह रीति क्यों बनी है और उसे तोडना क्यों उचित नहीं है |”
बाबा को हनुमान जी के शब्द सुनकर अत्यंत संतोष अनुभव हुआ | उन्होंने हनुमान जी के दर्शन के लिए फिर से अपना सिर ऊपर उठाया लेकिन तब तक हनुमान जी वहां से अदृश्य हो चुके थे | अब उस स्थान पर पुनः उर्मी बैठी थी |
कुछ समय पश्चात् चरण पूजा का अगला चरण शुरू हुआ | इस बार यजमान थी चरिता नाम की एक मातंग औरत | उर्मी को होतर नियुक्त किया गया |अर्पण की रीति प्रारंभ करने से पहले यजमान की आत्मा का हनुमान जी के शब्दों द्वारा पवित्र होना आवश्यक था |
हनुमान जी बोले - “चरण पूजा के पिछले चरण में उर्वा ने एक प्रश्न पूछा था - कि अगर रत्न गहरे समुद्र में हैं तो उन्हें वापिस लाना कैसे संभव है?
“उर्वा के प्रश्न से मुझे नल की याद हो आई - नल यानी वह वानर जिसने समुद्र के ऊपर सेतु का निर्माण किया था |
“जब भगवान् राम ने रावण के विरुद्ध युद्ध करने की ठानी तब करोडो वानर सेना में सम्मिलित होने के लिए इकट्ठे हो गए | लंका समुद्र के उस पार स्थित थी | इतनी बड़ी वानर सेना को समुद्र पार करवाना एक बड़ी चुनौती थी | भगवान् राम ने सेनापतियों से सलाह करने के लिए बैठक बुलाई |
“सुग्रीव ने विचार रखा - “प्रभु , हम पूरी सेना को लंका में नहीं उतार सकते | लंका के बाहरी हिस्से में इतनी बड़ी संख्या में सेना को ठहराने की व्यवस्था नहीं हो पाएगी | शत्रु की धरती पर सेना के लिए भोजनादि की कमी पड़ जायेगी | अतः हमें केवल आधी सेना के साथ आगे बढ़ना चाहिए | आधी सेना इस तरफ रुकी रहेगी | अगर युद्ध लम्बा चला तो इस तरफ की सेना को बाद में बुला लेंगे | हमारे पास कर्मबल बहुत है | जितनी नौकाओं की आवश्यकता पड़ेगी , वे जल्दी ही बन जायेंगी |”
“लक्ष्मण ने पूछा - “अगर रास्ते में समुद्र के राक्षसों ने आक्रमण कर दिया तो क्या होगा ? हमारी सेना समुद्र के खतरों से निपटने में कुशल नहीं है |”
“मैंने लक्षमण को भरोसा दिलाया कि अगर भगवान् राम की आज्ञा होगी तो मैं अकेला ही समुद के राक्षसों से लड़ने के लिए पर्याप्त हूँ | अतः समुद्र के खतरों से डरने की आवश्यकता नहीं है |
“अंगद बोला - “मुझे शक है कि रावण के पास समुद्र युद्ध में कुशल सेना की एक टुकड़ी है | अगर उसने उस टुकड़ी को समुद्र में भेज दिया तो हमारी सेना तो समुद्र में ही समाप्त हो जायेगी |”
“भगवान् राम बोले - “अभी युद्ध घोषित नहीं किया गया है | कोई भी योद्धा युद्ध घोषित किये बिना आक्रमण नहीं कर सकता |”
“लक्षमण ने टिपण्णी की - “रावण असुरों के प्रभाव में है | मुझे नहीं लगता कि वह क्षत्रियों के नियमों का पालन करेगा |”
“भगवान् राम बोले - “लक्षमण मुझे पता है कि रावण असुरों के प्रभाव में है लेकिन उसे अपनी सैन्य शक्ति के ऊपर बहुत अहंकार है इसलिए वह कायरता से आक्रमण नहीं करेगा |”
“सुग्रीव को अपनी योजना में कमी नजर आई | वह बोला - “हम आधी सेना को तो नौकाओं द्वारा बिना कठिनाई के ले जायेंगे, लेकिन अगर हमें इस तरफ बची सेना की बाद में आवश्यकता पड़ी तो उसे हम नहीं बुला पायेंगे | क्योंकि युद्ध घोषित होने के पश्चात् रावण समुद्र में भी आक्रमण करने के लिए स्वतंत्र होगा | वह अपने समुद्री योद्धा भेजकर हमारी सेना को समुद्र में ही ख़त्म कर देगा |” 
“जी हाँ|” अंगद ने अपना मत रखा - “किसी भी चीज से लड़ने के लिए हमारी सेना के पैरों के नीचे भूमि होनी आवश्यक है | उन्हें नौकाओं में युद्ध करने की कला नहीं आती |”
“भगवान् राम बोले - “अगर हम समुद्र में सेतु बना दे तो कैसा रहेगा? सेतु का पैरों तले होना भूमि होने जैसा ही है | सेतु के मार्ग से बाकी सेना को बुलाने में समस्या नहीं आएगी |”
“सभा में उपस्थित सभी ने आश्चर्य भरी दृष्टि से एक दुसरे को देखा | “समुद्र पर सेतु?” सुग्रीव बोले - “वह संभव नहीं है प्रभु |”
““नल इसे संभव कर सकता है |” प्रभु राम बोले |
““न ... नल ... हाँ ... नल नाम का एक कुशल वानर है तो सही जो सेतु बनाना जानता है | लेकिन उसे आप कैसे जानते हैं प्रभु?” सुग्रीव ने आश्चर्य से पूछा |
“यह एक अनुचित प्रश्न था : भगवान् राम, सर्वशक्तिमान प्रभु तो सबको जानते हैं | ऐसा कैसे हो सकता है कि वे किसी को न जानते हो? मैं बोल पड़ा - “क्यों न हम नल को बुलाकर पूछे कि वह सेतु निर्माण कर सकता है या नहीं?”
“सुग्रीव ने तुरंत उत्तर दिया - “वह वानर केवल एक वृक्ष से दुसरे वृक्ष के बीच सेतु बना सकता है | वह समुद्र में सेतु नहीं बना सकता | यह असंभव है |”
“मुझे ज्ञान था कि प्रभु श्री राम के लिए कुछ भी असंभव नहीं है | मैंने जोर डालकर कहा - “नल को बुलाकर उसी से पूछते हैं |”
“अंगद नल को बुलाने चला गया |
“जब अंगद पुनः सभा कक्ष में आया , नल उसके साथ था | नल आश्चर्यचकित था कि प्रभु राम उसे जानते थे और करोड़ों वानरों में से उसे बुलाया था | अंगद नल की तरफ से बोला - “प्रभु , मैंने नल से पूछा | वह कहता है कि वह पानी में सेतु नहीं बना सकता |”
“प्रभु राम नल की ओर मुस्कुराये और बोले - “नल , हर सृजनशील जीव भगवान् विश्वकर्मा का रूप है | अगर तुम दो वृक्षों के बीच सेतु बना सकते हो तो तुम यहाँ से लंका के बीच भी सेतु बना सकते हो | क्या तुम नहीं बना सकते?”
“नल सुन्न था | लेकिन उसने तुरंत उत्तर दिया जैसे कि उसके होंठों से शब्द अचानक गिर गए हों , “हाँ मैं बना सकता हूँ |”
“सभी ने नल की ओर देखा | नल का आत्मविश्वास उड़ गया और वह फिर से अनिश्चित सा लगा | प्रभु राम ने उसकी आँखों में देखा | फिर से जादू हुआ और वह सेनापतियों की उस सभा में जोर से बोला - “हां , मैं समुद्र में सेतु बना सकता हूँ | मैं समुद्र का अभी सर्वेक्षण करूँगा और फिर मैं सेतु की रूपरेखा तैयार करूँगा |”
“भगवान् राम ने मुझे नल के साथ समुद्र सर्वेक्षण के लिए जाने का निर्देश दिया |
“मैं नल के साथ सभा कक्ष से निकल गया | मैंने गौर किया कि नल कांप रहा था और बुदबुदा रहा था - “हाँ ... सेतु का निर्माण संभव है ... हाँ मैं सेतु बनाऊंगा ... “ उसका आत्मविश्वास पुनः डोल रहा था | वह अपने आपको भरोसा दिलाने का प्रयत्न कर रहा था |
“हमने एक नौका ली , कुछ रस्सियाँ और छड़ियाँ ली और समुद्र में निकल पड़े | नल विभिन्न स्थानों पर समुद्र की गहराई नापने लगा | समुद्र हर जगह बहुत गहरा था | नल निराश था | अंततः उसने आशा छोड़ दी और बोला - “इस समुद्र में सेतु बनाना असंभव है |”
““तो तुमने प्रभु राम को हाँ क्यों कहा?” मैंने पूछा|
“नल ने उत्तर दिया - “जब प्रभु राम ने मेरी तरफ देखा तो पता नहीं मुझे क्या हुआ | मुझे आभास हुआ कि मैं विश्वकर्मा हूँ और मैं किसी भी चीज का सृजन कर सकता हूँ | लेकिन जैसे ही मैं सभा कक्ष से बाहर आया , मुझे आभास हुआ कि मैं तो केवल एक साधारण वानर हूँ |”
“मैं बोला - “ओ नल , अगर भगवान् राम को तुझमे विश्वास है तो अवश्य ही तुम्हारे अन्दर कोई विशेष शक्ति है | चाहे पानी कितना भी गहरा हो , तुम सेतु बना सकते हो |”
“लेकिन ... कैसे?” नल असहाय होकर बोला - “मैं कैसे कहूँ ... यह बिलकुल असंभव है | मैं इस गहरे पानी में एक स्तम्भ भी खड़ा नहीं कर सकता|”
“हम समुद्र के बीचो बीच नौका चला रहे थे | नल अपने ऊपर इतनी बड़ी जिम्मेदारी पाकर भयभीत हो रहा था | उसने मुझसे प्रार्थना की कि मैं कोई सुझाव दूँ | मैंने उसको आँखे बंद करके प्रभु राम का जाप करने का सुझाव दिया |
“उसने अपनी आँखें बंद की और प्रभु राम के नाम का जाप करने लगा | मैं उसके चेहरे पर तेज देख सकता था | मैं बोला - “हे आत्मा जो प्रभु राम के नाम का जाप कर रही है , तुम कौन हो? अपना परिचय दो|”
“अपनी आँखें बंद किये हुए ही नल ने उत्तर दिया - “मैं नल हूँ , विश्वकर्मा का एक रूप | मैं अपने आपको समुद्र के बीचों बीच नींव खोदते हुए देख रहा हूँ | मैं स्वयं को समुद्र का सीना चीरते हुए देख सकता हूँ | हां मैं यह कर सकता हूँ | हाँ , मैं यह अवश्य करूँगा |”
“मुझे नल के चेहरे पर भगवान् विश्वकर्मा की झलक दिखाई दी | मैंने उसे आँखे खोलने को कहा |
“जब उसने आँखें खोली तो उसने कुछ विचित्र देखा | वह चिल्लाया - “अग्नि के गोले !”
“मैंने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि नल हमारी नौका से कुछ मीटर दूर स्थित एक बड़े मगरमच्छ की ओर संकेत कर रहा था | अपनी गदा पर पकड़ मजबूत करते हुए मैंने पूछा - “अग्नि के गोले? नहीं ! यह तो केवल एक मगरमच्छ है|”
““लेकिन मुझे इस मगरमच्छ में कुछ विचित्र नजर आया | इसकी आँखें दो आग के गोलों की तरह लग रही थी | और यह बिलकुल मेरी ओर देख रहा था |” नल ने जोर देकर कहा |
““अवश्य प्रकाश का कोई भ्रम रहा होगा , और कुछ नहीं|” मैंने नल को आश्वासन दिया लेकिन वह मगरमच्छ मुझे भी संदेहास्पद लग रहा था | एक साधारण समुद्री मगरमच्छ हम पर आक्रमण करने आना चाहिए था लेकिन जब हमने उसकी ओर देखा वह दूर चला गया |
“नल बोला - “मुझे पता नहीं ऐसा क्यों लगा कि वह मगरमच्छ रावण का जासूस है | क्या हमें उसका पीछा करके सत्य पता नहीं करना चाहिए?”
“नहीं.” मैं बोला - “समुद्र में ऐसे बहुत सारे जीव हैं | हमें केवल अपने कार्य पर ध्यान देना चाहिए | मैं इन जीवों पर तभी आक्रमण करूँगा जब वे हमें कोई हानि पहुँचाने का प्रयास करें |”
“कार्य ! ओह ...” नल बोला - “हमारे पास जो कार्य है वह असंभव है | मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि कहाँ से शुरू करें |”
““लेकिन कुछ पल पहले तुम्हारा मुख दैवीय शक्तियों से दैदीप्यमान था | जब तुम भगवान् राम के नाम का जप कर रहे थे तब मुझे तुम्हारे मुख में भगवान् विश्वकर्मा के दर्शन हुए थे |” मैंने उसे बताया |
“नल मजाक करते हुए बोला - “यह सेतु तभी बन सकता है अगर चट्टानें समुद्र में तैरने लगें |”
“मैंने गंभीरता से कहा - “अगर भगवान् राम की इच्छा हो तो कुछ भी असंभव नहीं है | अगर भगवान् राम सोचते हैं कि तुम सेतु बना लोगे तो जाओ और आराम करो | कल सुबह भगवान् राम के नाम का जाप करते हुए समुद्र में पत्थर फेंकना शुरू कर देना | वे तैरने लगेंगे अगर भगवान् राम की इच्छा हुई तो |”
“नल को पूर्ण विश्वास तो नहीं हुआ लेकिन उसके पास और कोई विकल्प भी नहीं था | मैंने उसको सर्वेक्षण बंद करने को कहा | मैं उसको सुदूर समुद्र में ले गया और उसे भिन्न भिन्न प्रकार के समुद्री जंतु दिखाए | उसने समुद्र दर्शन बाल उत्सुकता के साथ किया और सेतु की बात उसके मन से उतर गई |
“जब हम देर शाम अपनी सैन्य छावनी में लौटे, अंगद और सुग्रीव ने पूछा कि सर्वेक्षण पूर्ण हुआ कि नहीं | नल के पास कोई उत्तर नहीं था | मैंने उसकी तरफ से उत्तर दिया - “हाँ सर्वेक्षण पूरा हो चुका है | नल कल सेतु निर्माण आरम्भ करेगा |”
“मैंने भगवान् राम को मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देखा | वे यह सत्य जानते थे कि हम लोग सर्वेक्षण नहीं बल्कि पूरा दिन समुद्र दर्शन कर रहे थे और नौका सैर का आनंद ले रहे थे | वे यह भी जानते थे कि हमें तनिक भी विचार नहीं था कि सेतु कैसे बनेगा |
“अगली सुबह सबकी दृष्टि नल पर थी | सभी सेनापति समुद्र किनारे एकत्र थे | नल समुद्र किनारे इस तरह टहल रहा था जैसे वह कुछ माप रहा हो | उसे छेड़ने के विचार से मैंने पूछा - “हे महान नल ! निर्माण कहाँ से शुरू किया जाए? कृपा हमारा मार्गदर्शन करें ताकि हम आवश्यक सामान उस स्थान पर एकत्र कर सकें |”
“स्वाभाविक था कि नल बेचैन था और उसके होंठ गतिमान थे | वह धीरे धीरे भगवान् राम के नाम का जाप कर रहा था | जब मैंने उसको चिढाया, उसने मेरी तरफ देखा और जाप की ध्वनि तेज कर दी - “राम ... राम ... राम ...”
“अंगद और सुग्रीव ने मेरी ओर उत्सुकता से देखा | मैं तुरंत बोला - “अर्र ... हाँ .. राम .. राम ... राम ... नल के कहने का अर्थ है कि भगवान् राम बताएँगे सेतु कहाँ से शुरू करना है |”
“भाग्य से भगवान् राम लक्ष्मण के साथ वहां पहुँच गए और बोले - “हाँ , मेरे साथ आओ | हम पहले पूजा करेंगे , उसके बाद नल निर्माण आरम्भ कर सकता है |”
“ऐसा प्रतीत हुआ कि भगवान् राम को पहले से ही पता था कि सेतु निर्माण कहाँ से शुरू करना है | वे हमें वहां ले गए और पूजा आरम्भ की | नल अब भी बेचैन था लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास था कि सब कुछ सही होने वाला था |
“जब पूजा समाप्त हो गई तब पुनः नल की तरफ सबका ध्यान हो गया | जब भगवान् राम ने उसकी ओर देखा , उसकी बेचैनी उड़ गई और दिव्य शक्तियों का उसमे संचार हुआ | नल ने अपने हाथ से समुद्र की ओर संकेत किया और सिंहगर्जना की - “चलो समुद्र की छाती पर पहला पत्थर रखें | जय श्री राम |”
“मैंने भी उसके स्वर में अपना स्वर मिलाया और कहा - “जय श्री राम” और मैंने एक पत्थर समुद्र में उस तरफ फेंका जिस तरफ नल ने हाथ फैला रखा था | जब मेरा फेंका हुआ पत्थर पानी में नहीं डूबा तो वहां उपस्थित सभी लोगों के आश्चर्य और उत्साह का ठिकाना नहीं रहा | नल शायद किसी और ही संसार में खोया हुआ था | जब उसका मस्तिष्क वास्तविकता में लौटा तो अत्यंत आश्चर्य में पड़ गया | उसने शब्द तो एक भी नहीं बोला लेकिन उसकी आँखे मुझसे पूछ रही थी - “यह चमत्कार कैसे हुआ? संसार के नियम कैसे बदल गए? समुद्र में पत्थर कैसे तैरा?”
“मुझे कम से कम इस बात का तो विश्वास था कि भगवान् राम का कोई भी काम संसार के किसी नियम का उल्लंघन नहीं कर सकता | अगर पानी में पत्थर बाकी संसार के लिए नहीं तैरते तो भगवान् राम अपने कार्य हेतु नियम तोड़कर पत्थर नहीं तैरायेंगे |
“जब अंगद ने यह घोषणा की कि नल की कुशलता और भगवान् राम की कृपा से पानी में फेंका गया पत्थर तैर रहा है तो पूरी सेना ने जोर से भगवान् राम के नाम का उद्घोष किया | नल पूरी वानर जाति का नायक बन गया |
“नल तैरते हुए पत्थर का रहस्य जानना चाहता था | वह प्रभु राम से बोला - “प्रभु , मैं समुद्र में जाकर कुछ माप लेने के लिए आपकी आज्ञा चाहता हूँ | क्या मैं हनुमान जी के साथ जा सकता हूँ?”
“भगवान् राम की आज्ञा लेने के बाद हमने एक नौका ली और उस स्थान पर गए जहाँ पत्थर तैर रहा था | वहां जाकर देखा तो हम यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि पत्थर तैर नहीं रहा था , पत्थर तो एक टीले के ऊपर आराम से टिका हुआ था | नल आश्चर्य में बोला - “मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा है | यह टीला यहाँ कहाँ से आया? कल तो यहाँ गहरा पानी था | कैसा चमत्कार है यह ... रातों रात ... कैसे?”
“मेरे पास कोई उत्तर नहीं था | मैंने केवल इतना कहा - “भगवान् राम के नाम की शक्ति है यह!”
“नल ने आँखें बंद करके जोर से भगवान् राम का नाम जपा | मैं नौका चलाता रहा यह देखने के लिए कि टीला कहाँ तक है | हमने पाया कि वह चमत्कारी टीला पूरे समुद्र के आर पार उभर आया था | अब हमको करना सिर्फ यह था कि हम जहाँ तहां बची खाली जगहों को भरकर सतह को समतल कर दे | नल छोटे छोटे स्थानों को भरकर सेतु बनाने में कुशल था | अगले दो चार दिनों में हमने वानरों के भारी कर्मबल की सहायता से उस टीले को सपाट सेतु में बदल दिया |
“नल को वानर समाज में जो अचानक यश मिला था उससे वह सहज महसूस नहीं करता था | उसे लगता था कि वह इस यश का अधिकारी नहीं था क्योंकि टीला तो भगवान् राम की शक्तियों से उभरा था | जब सेतु पूरा बन गया , भगवान् राम ने उसे बताया - “हे नल , उस टीले के उभरने का कारण तुम हो, कोई और नहीं | अभी मैं तुम्हे यह नही बता सकता कि यह कैसे हुआ लेकिन युद्ध समाप्ति के पश्चात् तुम्हे मैं यह रहस्य अवश्य बताऊंगा|”
“नल को सम्मानित करते हुए भगवान् राम ने सेतु का नाम ‘नल सेतु’ रख दिया |
“युद्ध समाप्ति के पश्चात् नल ने भगवान् राम से टीले का रहस्य पूछा | हे बुद्धिमान मातंगो , क्या तुम यह अनुमान लगा सकते हो कि वह रहस्य क्या है?” हनुमान जी ने मातंगों की सभा से पूछा |
“उर्वा शांत बैठा हुआ था | हनुमान जी ने उसकी ओर देखा और कहा - “उर्वा के प्रश्न ने मुझे नल की याद दिला दी | नल कह रहा था कि समुद्र पर सेतु बनाना असंभव है और उर्वा कह रहा था कि समुद्र में से वे रत्न वापिस लाना असंभव है | मैं यह नहीं कह रहा कि चमत्कारी रूप से कोई टीला समुद्र में से निकल आयेंगा और वे रत्न ऊपर आ जायेंगे | मैं तो केवल इतना कह रहा हूँ कि कुछ भी असंभव नहीं है |”
उर्वा कुछ नहीं बोला | उर्मी पूजा की होतर थी | उसने खड़े होकर पूछा - “हे प्रभु , हम रहस्य जानने के लिए उत्सुक हैं | रातों रात समुद्र में टीला कैसे बना? कृपा हमें ब्रह्मज्ञान दें और रहस्य समझने में हमारी सहायता करें | हम अनुमान नहीं लगा सकते |”
हनुमान जी बोले - “मैं अब यह रहस्य बताने जा रहा हूँ | मेरे हर शब्द पर ध्यान देना अन्यथा तुन्हें यह समझ में नहीं आएगा |
“जब हम खुली हवा में होते हैं तो हम सहजता से जीवन जीते हैं लेकिन जब हम पानी के अन्दर जाते हैं तो हमें कठिनाई होती है | मछलियों के साथ इसका बिलकुल विपरीत होता है | मछली जब पानी में होती है तब वह सहज होती हैं लेकिन हवा में आते ही उसे कठिनाई होती है | कल्पना करो कि एक मछली गहरे पानी में है | क्या तुम मछली के संसार की मछली के दृष्टिकोण से कल्पना कर सकते हो?” हनुमान जी ने पूछा |
“होतर उर्मी जिसे देह बदलने का अनुभव है, ने तुरंत उत्तर दिया - “जिस तरह वायु हमारे लिए अदृश्य है , पानी मछलियों के लिए अदृश्य है | मेरे विचार से एक मछली पानी में वैसा ही अनुभव करती है जैसा एक पंछी हवा में करता है | वह अपने आस पास खुली जगह महसूस करती है जिसमे वह विचरण करती है |”
“बिलकुल ठीक|” हनुमान जी बोले - “क्या तुम सबको समझ में आ रहा है उर्मी ने जो कहा? क्या तुम सब मछली के संसार की कल्पना कर सकते हो? मछली के लिए पानी “गैस” है और हवा “द्रव” है | जब वह पानी में होती है तो उसे आस पास खुली जगह महसूस होती है, और जब वह हवा में होती है तब उसे अपने आस पास “द्रव” का आभास होता है जो उसका दम घोंट देता है |”
[टिपण्णी : हम मानवों का स्वभाव होता है कि हम हर चीज को अपने दृष्टिकोण से देखते और समझते हैं | लेकिन यहाँ पर आपको अपना दृष्टिकोण छोड़ना है | साधक रोज इसका अभ्यास करते हैं | पता नहीं मुख्यधारा के भक्त यह कर पायेंगे या नहीं | अगर अभी तक आपने यह अध्याय समझ लिया है तो आप गृहस्थ साधक है.] 
सभी मातांगो ने हामी भरी | हनुमान जी आगे बोले - “अब पाताल लोक की कल्पना करो| जब मैं पाताल में गया था तब मुझे वहां कुछ भी असाधारण नहीं लगा | वह बिलकुल हमारे संसार की तरह ही एक साधारण संसार दिखाई पड़ रहा था | हे मातंगो , ज़रा सोचो और बताओ | अगर पाताल धरती की गहराई में है तो वहां पर अंधकारमय और घुटनभरा सब होना चाहिए | मुझे वहां ऐसा क्यों नहीं अनुभव हुआ?”
होतर उर्मी ने उत्तर दिया - “अगर मैं अपनी मानव देह के साथ पानी में जाऊं तो मुझे वहां घुटन लगेगी , लेकिन अगर मैं मछली की देह धारण करके वहां जाऊं तो मुझे पानी के अन्दर कुछ भी असाधारण नहीं लगेगा | उसी प्रकार , हे प्रभु , आपकी देह पाताल में नहीं गई | आपकी आत्मा ने पाताल के किसी जीव की देह धारण करके पाताल का अनुभव किया था |”
हनुमान जी ने धरती की ओर इशारा करते हुए कहा - “देखो, हम एक ठोस धरा पर उपस्थित हैं | तो अगर पातालवासियों के लिए अन्दर से सब कुछ सामान्य है तो कम से कम उन्हें उनके संसार के ऊपर यह ठोस छत तो दिखाई देनी चाहिए? मैंने ऐसी कोई छत नहीं देखि | मुझे उनका आसमान भी अपने आसमान की तरह खुला दिखा | ऐसा क्यों?”
उर्मी को तुरंत कोई उत्तर नहीं सूझा | हनुमान जी ने उर्वा की ओर देखा | उसने बाबा मातंग की ओर देखकर अपना सिर नीचे कर लिया | हनुमान जी बोले - “उर्वा , अगर पूजा के घंटे के दौरान आप बोलोगे तो बाबा आपको नहीं डांटेंगे | बोलो !”
“प्रभु , मैं सोचता हूँ कि पाताल के जीवों के लिए हम और हमारा संसार अदृश्य हैं |” उर्वा ने खड़ा होकर धीमी आवाज में कहा - “मछली को पानी एक अदृश्य गैस जैसा लगता है उसी प्रकार पाताल के जीवो को हमारी ठोस चीजें अदृश्य गैस की भांति लगती हैं | इसलिए उन्हें अपने संसार के ऊपर कोई छत दिखाई नहीं देती |”
हनुमान जी सहमत दिखाई दिए | वे बोले - “हाँ , लेकिन वे किसी तरह हमारे संसार के बारे में जानते जरूर हैं | वे सोचते हैं कि उनके संसार के ऊपर एक मोटी अदृश्य परत है जिसमे जीव रहते हैं | अतः मानवलोक उनके लिए एक मोटी अदृश्य परत मात्र है | क्या तुम्हे पता है कि अहि और महि ने भगवान् राम और लक्ष्मण का हरण क्यों किया था?”
“क्योंकि रावण महि की देह में प्रवेश किया करता था , उसने अहि को भगवान् राम का हरण करने के लिए उकसाया |” उर्वा ने तुरंत उत्तर दिया |
“वो तो ठीक है लेकिन क्या तुम्हे मालुम है कि रावण ने पाताल के जीवों को भगवान् राम का हरण करने के लिए कैसे उकसाया?” हनुमान जी ने बताया , “महि की देह के माध्यम से उसने पाताल वालो को झूठी कहानी बताकर उन्हें विश्वास दिलाया कि मानवलोक के pप्राणी पाताललोक पर आक्रमण करने वाले हैं | उसने उनको विश्वास दिलाया कि राम और लक्ष्मण उस सेना का नेतृत्व कर रहे हैं जो पाताल पर आक्रमण करने की योजना बना रही है |”
“भगवान् राम और लक्षमण की (परम) आत्माओं का हरण करके उन्होंने उनको पाताल लोक की दो देहों में बंद कर दिया | उन्होंने एक दृष्टा को बुलाया जो आत्माओं से बात करने में कुशल था | अहि ने दृष्टा को कहा - “हे दृष्टा, हमने इन दो आत्माओं का हरण मानवलोक से किया है | गुप्त सूचना के अनुसार ये दो आत्माएं एक सेना का नेतृत्व कर रही हैं जो पाताल लोक पर आक्रमण करने वाली है | इन आत्माओं से पूछताछ करके इनकी योजना का पता लगाइए |”
“द्रष्टा ने प्रभु राम और लक्ष्मण की आत्माओं में झांककर पूछा - “हे आत्मा, तुम कौन हो |”
““मैं नल हूँ |” प्रभु राम ने उत्तर दिया |
“रावण जो वहां महि की देह में उपस्थित था , तुरंत बोला - “नहीं , वह नल नहीं है | वह राम है | वह झूठ बोल रहा है |”
““द्रष्टा ने कहा - “हे महि , मुझे इतना तो अनुभव है कि आत्मा झूठ बोल रही है या सच इसका पता कर सकूँ | यह आत्मा सत्य बोल रही है | उसका नाम नल है , राम नहीं |”
“महि (रावण) ने क्रोध में कहा , “हे द्रष्टा , आपसे भूल हुई है | वह राम है |”
[टिप्पणी : उपरोक्त पंक्ति में “महि(रावण)” का अर्थ है महि की देह + रावण की आत्मा | इसको “महिरावण” न पढ़ें | उस पाताल जीव का नाम “महि” था “महिरावण” नहीं |]
“द्रष्टा ने महि(रावण) की आँखों में देखा और बोले - “यह आत्मा तो नल है लेकिन अब मुझे संदेह हो रहा है कि तुम सच में महि की आत्मा हो या .... | मैं यह विश्वास क्यों न करूँ कि महि की देह में कोई बुरी आत्मा घुस गई है और मेरे ज्ञान पर संदेह कर रही है |”
“रावण जो वहाँ महि की देह में था, भयभीत हो गया | वह तुरंत क्रोध दिखाकर कक्ष से निकल गया | अहि के बीच में बोलने से महि द्रष्टा की नजरो से थोडा सा बच गया | अहि बोला - “हे द्रष्टा , इनका क्या नाम है उससे हमें कुछ लेना देना नहीं है | इनकी योजना का भेद लगाइए | पता लगाइए कि इस समय इनकी सेना कहाँ है |”
“इस समय?” द्रष्टा ने पूछा - “हमारा “इस समय” या इनका “इस समय”| ... क्योंकि इनका समय और हमारा समय सामूहिक नहीं है |
“अहि द्रष्टा के शब्दों में उलझ सा गया | बोला - “हे द्रष्टा , पाताललोक में आप ही तो मानवलोक मामलों के मंत्री हैं | मुझे बताया गया है कि आपके विभाग ने मानवलोक के बारे में काफी ज्ञान हासिल किया है | मैंने यह भी सुना है कि आपने ऐसे हथियार बनाए हैं जिनसे मानवलोक को काफी हद तक प्रभावित किया जा सकता है |”
““द्रष्टा ने उत्तर दिया - “मानवलोक हमारे लिए पूर्णतः अदृश्य है | लेकिन आत्मा वाचन के जरिये हमने उस लोक के बारे में काफी अध्ययन किया है | हमने पाया है कि हमारे संसार से इनके संसार का भूतकाल दिखाई देता है , वर्तमान नहीं | हम इनका भूतकाल प्रभावित कर सकते हैं , वर्तमान नहीं | उदाहरण के तौर पर , ये दो आत्माएं जो इस कक्ष में उपस्थित हैं , हम इनके भूतकाल से वार्तालाप कर सकते हैं , वर्तमान से नहीं |”
“अहि बोला - “हे द्रष्टा , मेरे पास आपकी विद्या को समझने का धैर्य नहीं है | कृपा अपनी विद्या के अनुसार इनसे वार्तालाप कीजिये और इनकी सेना को रोकने का कोई उपाय निकालिए |”
“द्रष्टा ने भगवान् राम की (परम) आत्मा में झाँका और पूछा - “हे आत्मा , तुम कौन हो |”
““मैं नल हूँ , विश्वकर्मा का एक रूप | मैं अपने आपको समुद्र के बीचों बीच नींव खोदते हुए देख रहा हूँ | मैं स्वयं को समुद्र का सीना चीरते हुए देख सकता हूँ | हां मैं यह कर सकता हूँ | हाँ , मैं यह अवश्य करूँगा |”  उत्तर मिला |
“कुछ पल बाद भगवान् राम ने द्रष्टा की आँखों में देखा और जोर से बोले - “अग्नि के गोले !” द्रष्टा घबरा गया | वह भगवान् राम से तुरंत दूर हो गया | अहि ने पूछा - “क्या हुआ द्रष्टा? क्या आपको कुछ अप्रिय दिखा?”
“अररर .. न ... नहीं ... कुछ अप्रिये नहीं ... उसे पता चल गया कि मैं उसकी आत्मा में झाँक रहा हूँ |” द्रष्टा ने भयपूर्ण आवाज में उत्तर दिया |
[वर्णन : पाताल लोक का द्रष्टा, मानवलोक के नल को उस मगरमच्छ की आँखों से देख रहा था | यहाँ पर काल के भ्रम पर गौर फरमाइए : जब भगवान् राम और लक्षमण का हरण करके पाताल ले जाया गया था तब लंका युद्ध चल रहा था . लेकिन पाताल के लोगों का संपर्क ह?

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