#महाभारत_ऐतिहासिक_प्रमाण
भारतीय वायुसेना के पायलटों ने समुद्र के ऊपर से उड़ान भरते हुए नोटिस किया था और उसके बाद 1970 के
जामनगर के गजेटियर में इनका उल्लेख किया गया। कि महाभारत कालीन द्वारिका सत्य है उसके बाद से
इन खंडों के बारे में दावों-प्रतिदावों का दौर चलता चल पड़ा।

बहरहाल, जो शुरुआत आकाश से वायुसेना ने की थी, उसकी सचाई भारतीय नौसेना ने सफलतापूर्वक उजागर कर दी।
एक समय था, जब लोग कहते थे कि द्वारिका नगरी एक काल्पनिक नगर है, लेकिन इस कल्पना को सच साबित कर
दिखाया ऑर्कियोलॉजिस्ट प्रो. एसआर राव ने।

प्रो. राव ने मैसूर विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद बड़ौदा में राज्य पुरातत्व विभाग ज्वॉइन कर लिया था। उसके बाद
भारतीय पुरातत्व विभाग में काम किया। प्रो. राव और उनकी टीम ने 1979-80 में समुद्र में 560 मीटर लंबी द्वारिका
की दीवार की खोज की। साथ में उन्हें वहां पर उस समय के बर्तन भी मिले, जो 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व
के हैं। इसके अलावा सिन्धु घाटी सभ्यता के भी कई अवशेष उन्होंने खोजे। उस जगह पर
भी उन्होंने खुदाई में कई रहस्य खोले, जहां पर कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ था।

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उतरी समुद्र में और...
नौसेना और पुरातत्व विभाग की संयुक्त खोज
:पहले 2005 फिर 2007 में भारतीय पुरातत्व
सर्वेक्षण के निर्देशन में भारतीय नौसेना के गोताखोरों
ने समुद्र में समाई द्वारिका नगरी के अवशेषों के
नमूनों को सफलतापूर्वक निकाला। उन्होंने ऐसे नमूने एकत्रित
किए जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। 2005 में नौसेना के
सहयोग से प्राचीन द्वारिका नगरी से
जुड़े अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-
छंटे पत्थर मिले और लगभग 200 नमूने एकत्र किए गए।
गुजरात में कच्छ की खाड़ी के पास
स्थित द्वारिका नगर समुद्र तटीय क्षेत्र में नौसेना
के गोताखोरों की मदद से पुरा विशेषज्ञों ने व्यापक
सर्वेक्षण के बाद समुद्र के भीतर उत्खनन कार्य
किया और वहां पड़े चूना पत्थरों के खंडों को भी ढूंढ
निकाला।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समुद्री
पुरातत्व विशेषज्ञों ने इन दुर्लभ नमूनों को देश-विदेशों
की पुरा प्रयोगशालाओं को भेजा। मिली
जानकारी के मुताबिक ये नमूने सिन्धु
घाटी सभ्यता से कोई मेल नहीं खाते,
लेकिन ये इतने प्राचीन थे कि सभी दंग
रह गए।
नौसेना के गोताखोरों ने 40 हजार वर्गमीटर के दायरे
में यह उत्खनन किया और वहां पड़े भवनों के खंडों के नमूने
एकत्र किए जिन्हें आरंभिक तौर पर चूना पत्थर बताया गया था।
पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि ये खंड बहुत ही
विशाल और समृद्धशाली नगर और मंदिर के अवशेष
हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक (धरोहर)
एके सिन्हा के अनुसार द्वारिका में समुद्र के भीतर
ही नहीं, बल्कि जमीन पर
भी खुदाई की गई थी और
10 मीटर गहराई तक किए गए इस उत्खनन में
सिक्के और कई कलाकृतियां भी प्राप्त हुईं।
इस समुद्री उत्खनन के बारे में सहायक नौसेना
प्रमुख रियर एडमिरल एसपीएस चीमा
ने तब बताया था कि इस ऐतिहासिक अभियान के लिए उनके 11
गोताखोरों को पुरातत्व सर्वेक्षण ने प्रशिक्षित किया और नवंबर
2006 में नौसेना के सर्वेक्षक पोत आईएनएस निर्देशक ने इस
समुद्री स्थल का सर्वे किया। इसके बाद इस साल
जनवरी से फरवरी के बीच
नौसेना के गोताखोर तमाम आवश्यक उपकरण और
सामग्री लेकर उन दुर्लभ अवशेषों तक पहुंच गए।
रियर एडमिरल चीमा ने कहा कि इन अवशेषों
की प्राचीनता का वैज्ञानिक अध्ययन
होने के बाद देश के समुद्री इतिहास और धरोहर का
तिथिक्रम लिखने के लिए आरंभिक सामग्री
इतिहासकारों को उपलब्ध हो जाएगी।
इस उत्खनन के कार्य के आंकड़ों को विभिन्न
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों
के सामने पेश किया गया। इन विशेषज्ञों में अमेरिका, इसराइल,
श्रीलंका और ब्रिटेन के विशेषज्ञ भी
शामिल हुए। नमूनों को विदेशी प्रयोगशालाओं में
भी भेजा गया ताकि अवशेषों की
प्राचीनता के बारे में किसी प्रकार
की त्रुटि का संदेह समाप्त हो जाए।
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