जय श्री राम जय श्री राम

जब अमृत-दूध देने वाली, गौ माँ को पशु कहने लगा।"



"देहस्थितासि रुद्राणी शंकरस्य सदा प्रिया ।
धेनुरुपेण सा देवी-दुर्गा मम पापं व्यपोहतु ।।"

अर्थात -- हे रुद्राणी ! तुम भगवान शंकर को सदा प्यारी हो तथा उनकी आधी देह में ( अर्धनारी रूप में ) स्थित रहती हो हे देवी-गौरी ''गौ'' के रूप में मेरे पाप का आप नाश करों ।।

इस पवित्र वैदिक मंत्र से शिद्द होता है कि "गाय-गौ" ही शक्ति स्वरूपा भगवती दुर्गा-शिव भार्या भवानी-उमा है । इस उमा देवी ने ही लोक कल्याण हेतु समस्त संसार के अपने भक्त जनों और ख़ासकर तपस्वियों, वैदिक ब्राह्मणों, ऋषि-मुनियों के कठोर तप को शिद्द करने, राजर्षि वीरों के बल को पृष्ठ करने, देश-धर्म की समृद्दी हेतु वैश्यों को गौ-आधारित व्यापर से पुण्य कमाने तथा विश्व के अन्य छोटे-बड़े समाज के लोगों को गौ-सेवा कार्य से महान यस प्राप्त कराने ही यह ''कामधेनु-गाय'' का शरीर धारण किया है ।
ताकि इन सभी पावन बुद्दी मानवों के शरीर को पृष्ठ कर, धर्म मार्ग का अनुसरण और वेद-मार्ग का प्रचार-प्रसार कर दैवी "सनातन धर्म" की सदा रक्षा की जा सकें ।

क्योकिं गौ-प्राण संत कहते है --

"।। वेद के बिना मति नही, गाय के बिना गति नही।।"
अर्थात :-
वेद पढ़ने वाले बटुकों-आचार्यों को गाय का दूध के साथ-साथ अधिक मात्रा लेना चाहिए, ताकि वेद के मंत्र आसानी से कण्ठस्थ हो सकें । तथा अंत समय मे उसी गाय की पूछ पकड़ा कर वैतरणी पार करने हेतु संसार की जननी दुर्गा-भगवती ही शिव-लोक और गौ- लोक ले जाकर उस आत्मा को मुक्ति दे सदगति प्रदान करती है ।

समस्त लोकों के कल्याण हेतू ही एक समय भगवती पार्वती जी ने अखंड निराहार व्रत रखकर भगवान विष्णु को मनाया और ''महा-वरदान'' में शिव-पारवती के पुत्र रूप में अवतार लेने का आशीर्वाद प्राप्त किया । परिणाम स्वरूप गाय रूपा-भगवती-भवानी के पुत्र रूप में देवी पारवती के शरीर के मैल-''गोबर से गणेश'' रूप में ही विष्णु भगवान प्रकट हुए । जो पहले भी भगवान शिव के प्रथम पूज्य देव थे और बाद में भी लीला पूर्वक भगवान शिव ने उनको अपना और ब्रहमाण्ड का प्रथम पूज्य देव बनाया । इसलिए सदा गणेश जी के साथ लक्ष्मी जी को विराजित किया जाता है ।
एक और बात धर्मानुरागी मनुष्यों को ध्यान देने वाली है जो गंगा संसार मे तरल रूप में संसार के समस्त जीव धारियों की करोड़ों वर्षों से जीवन रेखा बनी हुई है, उसको भी धरती तक पहुचाने की कृपा भी भगवती दुर्गा-गौ माता ने ही की हैं । जब दुर्गा के भय से गंगा जल बनकर शिव जटा में समा गई तो दुर्गा ने उसे पी लिया फिर लोक कल्याण हेतु ही सूर्यवंशी राजर्षि भगीरथ की प्रार्थना पर "गौ मुख" से संसार को समर्पित कर दिया ।

अतः लोक कल्याण हेतु ही 1857 की गौ-क्रांति की पुण्य भूमि मेरठ के विद्द्वानों-साहित्यकारों द्वारा ''सर्वदलीय गौरक्षा मंच'' के निवेदन पर जल्द प्रकाशित इस पावन "गौ महिमा पुस्तक" का सार यह है कि जब-जब संसार के जीव धारियों को किसी भी प्रकार के कष्ट आते है यही दुर्गा-शक्ति अपने अनेक रूपों के अलावा अपने कल्याणकारक "गाय"- "गौ" रूप में जीव मात्र का कल्याण करने प्रकट होती है । जो सनातनी इस गुड से भी गुड रहस्य को जान पाते है उनको फिर ----
"पुनरिप जननं पुनरिप मरणं,
पुनरिप जननी जठरे शयनम ।।"
से मुक्ति मिल जाती है ।
और जो विधि (जन्म दाता ब्रह्मा ) के मारे अविद्या के कारण इस कामधेनु-गाय को पशु मान कर हत्या करते है या अनेक प्रकार से कष्ट तथा यातना देते है , वही 'मानव' महामाया के श्राप वस बारबार जन्म लेकर राक्षसी प्रवृति में ही रत रहकर 84 लाख योनियों तक फिर जन्म-मरण के चक्कर मे फंस जाते है ।
अहो ! कितना दुर्भाग्य है उस मानव का जो 83 लाख 99 हजार 9 सौ 99 योनियों के बाद जब मानव योनि मिली तो एक हत्यारा बन संसार के लोगों के कल्याण हेतु भेजी गई संसार की मालकिन दुर्गा की ही प्रतिमूर्ति गाय का ही वध कर अपने को फिर करोड़ों वर्ष नर्क में ले जा रहा है । जबकि इस माँ को सिर्फ बेकार पड़ी हुई घास-सूखे तृणों परोषने से भी प्रसन्न किया जा सकता है ।
अहों ! उनके भाग्य की क्या सराहना करे गौ-चरण दास ''राजर्षि नयाल सनातनी'' जो गाय को नित्य हरी-हरी घास के साथ सुंदर पकवान भी परोषते रहते है, उसके लिए सुन्दर वातानुकूलित भवनों का निर्माण कर गौ-माँ को सुख पूर्वक रखते है !

ध्यान रहे !
गणेश-सूर्य-ब्रह्मा-विष्णु-महेश इन पंच प्रधान देवताओं को भी वह अधिकार प्राप्त नहीं है जो ''गौ रूप धारी''- ''दुर्गा-भवानी'' के गौ-मुख से निकली ''गंगा'' और अंत समय में जीवन भर गौ सेवा किये वैतरणी पर पूछ पकडे व्यक्ति को ''भव-सागर'' पार कर मुक्ति प्रदान करने वाली ''गाय'' को प्राप्त है ---
"हे कलयुग के मानव रे, सबसे बड़ा पशु तू तब बना,
जब अमृत-दूध देने वाली, गौ माँ को पशु कहने लगा।"

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